तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे बलिहार शंकर जी Teri Mand Mand Muskaniya Pe Balihar Shankar Ji

Teri Mand Mand Muskaniya Pe Balihar Shankar Ji : भगवान शिव की अत्यंत सौम्य मुस्कान और उनके दिव्य, अघोर श्रृंगार का वर्णन करने वाले मधुर भजन “Teri Mand Mand Muskaniya Pe Balihar Shankar Ji” का संपूर्ण भावार्थ , गायन का सही समय और आध्यात्मिक महत्व विस्तार से जानें।

Teri Mand Mand Muskaniya Pe Balihar Shankar Ji

तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे बलिहार शंकर जी

तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे ,
बलिहार शंकर जी |
तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे ,

बलिहार शंकर जी ||

तेरे मस्तक चंदा सोहे,
शिवशंकर डमरू वाले |
तेरी जटा से बह रही गंगा है,
बलिहार शंकर जी ||
तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे
बलिहार शंकर जी
तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे

बलिहार शंकर जी ||

तेरे गले सर्प की माला,
नंदी की सवारी वाला |
तुझे कहते पशुपतिनाथ जी,
बलिहार शंकर जी ||
तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे
बलिहार शंकर जी |
तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे ,

बलिहार शंकर जी ||

तेरे भुत पिशाचों की टोली,
देखि है बहुत अनोखी |
तेरा होता भस्म सिंगार है,
बलिहार शंकर जी ||
तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे,
बलिहार शंकर जी |
तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे
,
बलिहार शंकर जी ||

Teri mand mand muskaniya pe,
Balihaar Shankar ji |
Teri mand mand muskaniya pe,
Balihar Shankar ji ||

Tere mastak chanda sohe,
Shivshankar damru wale |
Teri jata se beh rahi Ganga hai,
Balihar Shankar ji ||
Teri mand mand muskaniya pe
Balihar Shankar ji
Teri mand mand muskaniya pe
Balihaar Shankar ji ||

Tere gale sarp ki mala,
Nandi ki sawari wala |
Tujhe kehte Pashupatinath ji,
Balihaar Shankar ji ||
Teri mand mand muskaniya pe
Balihar Shankar ji |
Teri mand mand muskaniya pe,
Balihar Shankar ji ||

Tere bhut pishachon ki toli,
Dekhi hai bahut anokhi |
Tera hota bhasm singar hai,
Balihar Shankar ji ||
Teri mand mand muskaniya pe,
Balihar Shankar ji |
Teri mand mand muskaniya pe,
Balihar Shankar ji ||

तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे बलिहार शंकर जी – संपूर्ण विवरण और महिमा

सनातन हिंदू धर्म में भगवान शिव (शंकर जी) को वैसे तो रौद्र और भयंकर रूप (महाकाल) में भी पूजा जाता है, लेकिन उनका एक अत्यंत शांत, सौम्य और भोला स्वरूप भी है जिसे ‘आशुतोष’ या ‘भोलेनाथ’ कहा जाता है। “Teri Mand Mand Muskaniya Pe Balihar Shankar Ji” एक ऐसा ही अत्यंत मधुर और वात्सल्य भाव से भरा भजन है।

यह भजन मूल रूप से भगवान श्री राम के प्रसिद्ध भजन (तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे बलिहार राघव जी) की ही तर्ज पर शिव जी को समर्पित किया गया है। इस भजन में भक्त शिव जी के अद्भुत श्रृंगार (सांप, भस्म, भूत-पिशाच) को देखकर भी भयभीत नहीं होता, बल्कि उनकी उस ‘मंद-मंद’ (सौम्य) मुस्कान पर अपना सर्वस्व न्योछावर (बलिहार) कर देता है।

संपूर्ण भावार्थ (Bhavarth of the Bhajan)

यह भजन भगवान शिव के वैरागी श्रृंगार और उनके भोलेपन का अत्यंत सुंदर चित्रण है। आइए, इसका एक-एक पद और शब्द का विस्तृत विश्लेषण करें:

मुखड़ा का भावार्थ (सौम्य मुस्कान)

तेरी मंद मंद मुस्कनिया पे बलिहार शंकर जी

भावार्थ (Meaning): हे भगवान शंकर! आपकी यह जो अत्यंत धीमी, शांत और मन को मोह लेने वाली सौम्य मुस्कान (मंद मंद मुस्कनिया) है, मैं उस पर अपना सब कुछ न्योछावर (बलिहार) करता हूँ। आपकी एक मुस्कान ही मेरे सारे कष्टों को मिटाने के लिए पर्याप्त है।

पद 1 का भावार्थ (गंगा और चंद्रमा)

तेरे मस्तक चंदा सोहे, शिवशंकर डमरू वाले, तेरी जटा से बह रही गंगा है, बलिहार शंकर जी

भावार्थ (Meaning): हे डमरू धारण करने वाले शिव शंकर! आपके भव्य मस्तक पर चंद्रमा (चंदा) अत्यंत सुशोभित (सोहे) हो रहा है, जो शीतलता और शांति का प्रतीक है। आपकी घनी जटाओं से परम पवित्र माता गंगा निरंतर बह रही हैं। आपके इस अद्भुत और कल्याणकारी रूप पर मैं बलिहार जाता हूँ।

पद 2 का भावार्थ (पशुपतिनाथ स्वरूप)

तेरे गले सर्प की माला, नंदी की सवारी वाला, तुझे कहते पशुपतिनाथ जी, बलिहार शंकर जी

भावार्थ (Meaning): हे महादेव! आपके गले में भयंकर और विषैले सर्पों (सांपों) की माला पड़ी हुई है, और आप अपने परम भक्त ‘नंदी’ (बैल) की सवारी करते हैं। आप संसार के सभी जीवों और पशुओं के स्वामी हैं, इसीलिए दुनिया आपको ‘पशुपतिनाथ’ (नेपाल का सुप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग स्वरूप) के नाम से पूजती है। मैं आपके इस स्वरूप पर बलिहार हूँ।

पद 3 का भावार्थ (अघोर श्रृंगार और भूत-भावन)

तेरे भुत पिशाचों की टोली, देखि है बहुत अनोखी, तेरा होता भस्म सिंगार है, बलिहार शंकर जी

भावार्थ (Meaning): हे शिव! आपका दरबार दुनिया से बिल्कुल अलग है। आपके साथ हमेशा भूत, प्रेत, और पिशाचों की एक बहुत ही अनोखी टोली चलती है (क्योंकि आप समाज द्वारा तिरस्कृत लोगों को भी अपनाते हैं)। आपका श्रृंगार किसी कीमती आभूषण से नहीं, बल्कि चिता की राख (भस्म) से होता है। आपके इस परम वैरागी स्वरूप को देखकर मैं अपना सर्वस्व आप पर न्योछावर करता हूँ।

भजन गायन और श्रवण का सही समय (Practices Time)

यह भजन ईश्वर के प्रति प्रेम और आनंद का प्रतीक है। आध्यात्मिक शांति के लिए इसे सुनने और गाने के कुछ विशेष अवसर इस प्रकार हैं:

  • प्रातःकालीन ध्यान (Morning Devotion): सुबह की पूजा के समय या शिवलिंग का अभिषेक करते समय, ईश्वर के मुस्कुराते हुए स्वरूप का ध्यान करते हुए इसे गाना अत्यंत फलदायी होता है।
  • सावन और शिवरात्रि (Festivals): श्रावण मास (सावन) के सोमवार या महाशिवरात्रि के जागरण के दौरान, जब भक्त शिव के आनंद में डूबे होते हैं, तब इस भजन का गान पूरे वातावरण को उल्लास से भर देता है।
  • भय दूर करने के लिए: जब भी मन में किसी प्रकार का डर (Fear) हो, तो यह भजन याद दिलाता है कि शिव जी भूत-पिशाच और सर्पों के स्वामी होकर भी कितनी सौम्य मुस्कान रखते हैं। इससे मन का सारा भय दूर हो जाता है।

आध्यात्मिक महत्व (Importance)

इस भजन का सबसे बड़ा आध्यात्मिक महत्व ‘विरोधाभास में भी परम शांति’ (Peace amidst Chaos) का संदेश देना है।

भगवान शिव गले में सांप, भूत-पिशाचों की टोली और शरीर पर भस्म धारण करते हैं—ये सभी चीज़ें संसार की दृष्टि में भयंकर या डरावनी हो सकती हैं। लेकिन इन सबके बीच भी शिव जी के चेहरे पर एक ‘मंद-मंद मुस्कान’ बनी रहती है। यह मनुष्य को सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी भयानक या विषम परिस्थितियां (सर्प और पिशाच) क्यों न आएं, व्यक्ति को अपने भीतर की शांति और चेहरे की सौम्य मुस्कान कभी नहीं खोनी चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: शिव जी के चेहरे पर यह सौम्य (मंद-मंद) मुस्कान क्या दर्शाती है? उत्तर: शिव जी की मुस्कान उनकी आंतरिक शांति, उनके ‘सच्चिदानंद’ स्वरूप और उनके परम वैराग्य को दर्शाती है। वे ब्रह्मांड के स्वामी हैं, लेकिन उन्हें इसका कोई अहंकार नहीं है।

प्रश्न 2: शिव जी को “पशुपतिनाथ” क्यों कहा जाता है? उत्तर: ‘पशु’ का अर्थ केवल जानवर नहीं, बल्कि अज्ञानता में बंधे हुए सभी जीव हैं, और ‘पति’ का अर्थ स्वामी या रक्षक है। शिव जी सभी जीवों (मनुष्य, पशु, भूत-पिशाच) को अज्ञान रूपी बंधन से मुक्त करने वाले स्वामी हैं, इसलिए उन्हें पशुपतिनाथ कहा जाता है। नेपाल के काठमांडू में उनका विश्व प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर स्थित है।

प्रश्न 3: शिव जी का श्रृंगार भस्म (राख) से क्यों होता है? उत्तर: भस्म इस बात का प्रतीक है कि यह भौतिक संसार और शरीर नश्वर है, जिसे अंततः राख में बदल जाना है। शिव जी भस्म लगाकर दुनिया को इस अंतिम सत्य का भान कराते हैं और सांसारिक मोह से दूर रहने का संदेश देते हैं।

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