Gadhkalika Aarti : माँ गढ़कालिका की अद्भुत स्तुति “Aarti Gadhkali Mata Ki” का संपूर्ण भावार्थ (Bhavarth), ऐतिहासिक उत्पत्ति (Origin), पूजा का सही समय (Practices Time) और धार्मिक महत्व (Importance) विस्तार से जानें। इस लेख में Gadhkalika Temple Dhar और Gadhkalika Temple Ujjain के अद्भुत रहस्यों, राजा भोज और महाकवि कालिदास से जुड़े प्रसंगों को भी विस्तार से समझाया गया है। संपूर्ण जानकारी और FAQs के लिए यह विस्तृत लेख पढ़ें।
ॐ क्रां काल्यै नमः |
ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परिपूर्णेन्द्रिकायै नमः |
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै नमः |
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं परमेश्वरी कालिकायै नमः |
ॐ नमः काल्यै नमः |
ॐ नमः कालिकायै नमः |
ॐ नमः महाकाल्यै नमः |
ॐ नमः महाकालिकायै नमः |
ॐ काल्यै नमः |
ॐ महाकालिकायै नमः |
Gadhkalika Aarti : माता गढ़कालिका की आरती
| मैया करूं गढकाली तोरी आरती हो मां -2 मैेया आरती मां बेल फूल चढाउं वो मोरी माय-2 हल्दी कुंकू नारियल धूप दीप, कपूरल सजी थार -2 आरती गढकाली की- हो मैया-आरती गढकाली की गांव हरेक पवार -2 (मैया) करूं गढकाली तोरी आरती …. ब्रम्हाण्ड की रखवारी तू, धारा नगर ठिकान -2 राजा भोज ल पायो-2, तोल बुद्धि अन ज्ञान-2 (मैया) करूं गढकाली ……. य धरती को कोना कोना मं, फैल्या जो पवार-2 हमीं सब तोराच बेटा-2, देजो बुद्धि अन ज्ञान-2 (मैया) करूं गढकाली ……. तेरो दरषन का प्यासा, बेटा मां, करखेत पुकार-2 कर सबकी मनसा पुरी-2, धन्य होये सब पवार-2 (मैया) करूं गढकाली ……. कुलदेवी माय तु हमारी, कर देजो मां उद्धार -2 गेवरी गाउ मैया कमसे,-2, तोरी महिमा स अपार-2 (मैया) करूं गढकाली ……. |
Mata Gadkalika Aarti Lyrics in English
Maiya Karun Gadkali Tori Aarti Ho Maa -2
Maiya Aarti Maa Bel Phool Chadhaun Wo Mori Mai -2
Haldi Kumkum Nariyal Dhoop Deep, Kapoor Se Saji Thar -2
Aarti Gadkali Ki – Ho Maiya – Aarti Gadkali Ki
Gaon Harek Pawar -2 (Maiya) Karun Gadkali Tori Aarti…
Brahmand Ki Rakhwari Tu, Dhara Nagar Thikan -2
Raja Bhoj La Payo -2, Tol Buddhi An Gyaan -2
(Maiya) Karun Gadkali…
Ye Dharti Ko Kona Kona Mein, Phailya Jo Pawar -2
Hamein Sab Torach Beta -2, Dejo Buddhi An Gyaan -2
(Maiya) Karun Gadkali…
Tero Darshan Ka Pyasa, Beta Maa, Karkhet Pukaar -2
Kar Sabki Mansa Puri -2, Dhany Ho Sab Pawar -2
(Maiya) Karun Gadkali…
Kuldevi Mai Tu Hamari, Kar Dejo Maa Uddhar -2
Gevra Gaon Maiya Kamse, -2, Tori Mahima Se Apar -2
(Maiya) Karun Gadkali…
मैया करूं गढ़काली तोरी आरती (Aarti Gadhkalika Mata Ki)
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में ‘कुलदेवी’ की उपासना का अत्यंत विशिष्ट महत्व है। मालवा (मध्य प्रदेश) की पावन भूमि पर माँ कालिका का एक अत्यंत ही जाग्रत और चमत्कारी स्वरूप विराजमान है, जिसे ‘माँ गढ़कालिका’ (Maa Gadhkalika) के नाम से जाना जाता है। माँ गढ़कालिका मुख्य रूप से परमार (पवार) राजवंश की कुलदेवी हैं। उनके द्वारा गाई जाने वाली “मैया करूं गढकाली तोरी आरती हो मां” एक अत्यंत ही भावपूर्ण, ऐतिहासिक और क्षेत्रीय भाषा (मालवी/निमाड़ी और मराठी के पुट के साथ) में रची गई वंदना है। यह आरती केवल देवी की स्तुति नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर धार नगरी (Dhara Nagar) के महान राजा भोज के ज्ञान और पवार वंश के गौरवशाली इतिहास को समेटे हुए है।
इस अत्यंत विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख में हम माँ गढ़कालिका को समर्पित इस दिव्य स्तुति Aarti Gadhkalika Mata Ki का संपूर्ण पाठ, Gadhkalika Temple Dhar और Gadhkalika Temple Ujjain का ऐतिहासिक व पौराणिक संबंध (Origin), गहरा भावार्थ (Bhavarth), इसके गान और आरती करने की सही विधि व समय (Practices Time), इसका आध्यात्मिक महत्व (Importance) और इससे जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) प्रस्तुत कर रहे हैं।
आरती का विस्तृत विवरण (Description of Aarti Gadhkalika Mata Ki)
यह Aarti Gadhkalika Mata Ki आरती विशुद्ध रूप से लोक-परंपरा (Folk Tradition) से उपजी हुई है। इसमें उपयोग की गई भाषा मालवा की क्षेत्रीय भाषा और पवार (परमार) समाज की बोली का एक सुंदर मिश्रण है।
इस आरती में माँ गढ़कालिका को ‘ब्रह्मांड की रखवारी’ (संपूर्ण विश्व की रक्षक) कहा गया है। यह आरती किसी साधारण भक्त की पुकार नहीं है, बल्कि यह एक पूरे राजवंश (पवार/परमार समाज) की अपनी कुलदेवी के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रकटीकरण है। इसमें भक्त देवी से कोई भौतिक संपदा नहीं मांगते, बल्कि वे ‘बुद्धि और ज्ञान’ की मांग करते हैं, ठीक उसी तरह जैसे देवी ने उनके पूर्वज महान चक्रवर्ती सम्राट राजा भोज को प्रदान किया था। आरती में थाली सजाने से लेकर, धरती के कोने-कोने में फैले पवार समाज की एकता और देवी दर्शन की लालसा का बहुत ही सजीव और हृदयस्पर्शी वर्णन (Description) किया गया है।
उत्पत्ति, इतिहास और मंदिर (Origin: Gadhkalika Temple Dhar & Ujjain)
माँ गढ़कालिका की उत्पत्ति और महिमा को पूरी तरह से समझने के लिए हमें मध्य प्रदेश के दो अत्यंत प्राचीन और पवित्र नगरों—उज्जैन (Ujjain) और धार (Dhar) के Gadhkalika Temple के इतिहास (Origin) को समझना होगा। ये दोनों मंदिर माँ के चमत्कार और महिमा के जीवंत प्रमाण हैं:
1. गढ़कालिका मंदिर, उज्जैन (Gadhkalika Temple Ujjain)
उज्जैन (अवंतिका) में स्थित गढ़कालिका मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और सिद्ध शक्तिपीठों में गिना जाता है।
- शक्तिपीठ की मान्यता: शिव पुराण और तंत्र चूड़ामणि के अनुसार, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर ब्रह्मांड में घूम रहे थे, तब यहाँ माता सती के ‘ओष्ठ’ (ऊपरी होंठ) गिरे थे। इसलिए यह एक महाशक्तिपीठ है।
- महाकवि कालिदास की आराध्या: Gadhkalika Temple Ujjain का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग ‘महाकवि कालिदास’ से जुड़ा है। कालिदास पहले एक अत्यंत मूर्ख व्यक्ति थे (जो उसी पेड़ की डाली काट रहे थे जिस पर बैठे थे)। अपनी पत्नी विद्योत्तमा से अपमानित होने के बाद उन्होंने इसी गढ़कालिका मंदिर में माता की घोर तपस्या की। माता गढ़कालिका ने प्रसन्न होकर उनकी जीभ पर अपने नाखूनों से ‘ॐ’ लिख दिया, जिसके बाद वे संस्कृत साहित्य के सबसे महान विद्वान और ‘महाकवि कालिदास’ (अभिज्ञान शाकुंतलम और मेघदूत के रचयिता) बन गए।
- तांत्रिक महत्व: उज्जैन का यह मंदिर तांत्रिकों और साधकों के लिए साधना का एक प्रमुख केंद्र है।
2. गढ़कालिका मंदिर, धार (Gadhkalika Temple Dhar) – आरती का मुख्य आधार
प्रस्तुत आरती का सीधा संबंध Gadhkalika Temple Dhar और वहां के परमार (पवार) राजवंश से है। आरती में “धारा नगर ठिकान” और “राजा भोज” का स्पष्ट उल्लेख है।
- धारा नगरी (Dhar Nagar): धार मध्य प्रदेश का एक ऐतिहासिक नगर है, जो 9वीं से 13वीं शताब्दी तक परमार (पवार) राजाओं की राजधानी रहा।
- राजा भोज की कुलदेवी: सम्राट राजा भोज (1010–1055 ई.) केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि वास्तुकला, विज्ञान, साहित्य और योग के उद्भट विद्वान थे (उन्होंने ‘भोजशाला’ का निर्माण कराया)। आरती यह बताती है कि राजा भोज को यह असीम बुद्धि और ज्ञान उनकी कुलदेवी माँ गढ़कालिका की कृपा से ही प्राप्त हुआ था।
- पवार वंश का विस्तार: कालान्तर में ऐतिहासिक उथल-पुथल के कारण परमार (पवार) समाज धार नगरी से भारत के विभिन्न हिस्सों (विशेषकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के अन्य भागों) में फैल गया। लेकिन आज भी, “य धरती को कोना कोना मं, फैल्या जो पवार”, वे धार स्थित अपनी माँ गढ़कालिका को नहीं भूले हैं और नित्य उनकी यह आरती गाते हैं।
संपूर्ण भावार्थ (Bhavarth of Aarti Gadhkalika Mata Ki)
आइए, इतिहास और भक्ति से ओत-प्रोत इस लोक-आरती के Bhavarth of Aarti Gadhkalika Mata Ki का पंक्ति-दर-पंक्ति गहरा विश्लेषण करें:
पद 1 का भावार्थ
मैया करूं गढकाली तोरी आरती हो मां -2 मैेया आरती मां बेल फूल चढाउं वो मोरी माय-2 हल्दी कुंकू नारियल धूप दीप, कपूरल सजी थार -2 आरती गढकाली की- हो मैया-आरती गढकाली की गांव हरेक पवार -2 (मैया) करूं गढकाली तोरी आरती ….
भावार्थ (Meaning): हे मेरी माँ गढ़कालिका! मैं तुम्हारी आरती उतार रहा हूँ। हे मेरी माता, तुम्हारी आरती करते समय मैं तुम्हें बेलपत्र और ताज़े फूल अर्पित कर रहा हूँ। मैंने तुम्हारी पूजा की थाली को हल्दी, कुमकुम (सिंदूर), नारियल, धूप, दीप और कपूर से बहुत ही सुंदरता से सजाया है। हे मैया गढ़काली, तुम्हारी यह आरती पवार (परमार) समाज का हर एक व्यक्ति (हरेक पवार) गा रहा है। मैं तुम्हारी आरती करता हूँ।
पद 2 का भावार्थ
ब्रम्हाण्ड की रखवारी तू, धारा नगर ठिकान -2 राजा भोज ल पायो-2, तोल बुद्धि अन ज्ञान-2
भावार्थ (Meaning): हे भवानी! तुम इस पूरे ब्रह्मांड की रक्षा करने वाली हो (रखवारी तू), और तुम्हारा मुख्य निवास स्थान (ठिकान) पावन ‘धारा नगर’ (धार नगरी, मध्य प्रदेश) है। हे माँ! हमारे महान पूर्वज महाराजा भोज (राजा भोज) ने तुम्हारी ही कृपा और आशीर्वाद से असीम (तोल/अतुलनीय) बुद्धि और परम ज्ञान प्राप्त किया था। (राजा भोज ने 84 से अधिक ग्रंथ लिखे थे, यह सब माता की ही कृपा थी)।
पद 3 का भावार्थ
य धरती को कोना कोना मं, फैल्या जो पवार-2 हमीं सब तोराच बेटा-2, देजो बुद्धि अन ज्ञान-2
भावार्थ (Meaning): हे माँ गढ़काली! समय के साथ परमार (पवार) वंश के लोग इस धरती (भारतभूमि) के कोने-कोने में फैल गए हैं (निवास करने लगे हैं)। लेकिन हम चाहे जहाँ भी रहें, हम सब तुम्हारे ही बच्चे (तोराच बेटा) हैं। हे कुलदेवी, जिस प्रकार तुमने राजा भोज पर कृपा की थी, उसी प्रकार हम सभी बच्चों को भी सद्बुद्धि और श्रेष्ठ ज्ञान (बुद्धि अन ज्ञान) का आशीर्वाद देना।
पद 4 का भावार्थ
तेरो दरषन का प्यासा, बेटा मां, करखेत पुकार-2 कर सबकी मनसा पुरी-2, धन्य होये सब पवार-2
भावार्थ (Meaning): हे मेरी माँ! तुम्हारे ये सभी बच्चे (भक्त) तुम्हारे पवित्र दर्शनों के लिए प्यासे हैं (लालायित हैं) और दूर-दूर से तुम्हें पुकार रहे हैं। हे जगदंबे! तुम अपने सभी बच्चों की मनोकामनाओं (मनसा) को पूरा करो, ताकि तुम्हारी कृपा प्राप्त करके संपूर्ण पवार समाज धन्य और कृतार्थ हो जाए।
पद 5 का भावार्थ
कुलदेवी माय तु हमारी, कर देजो मां उद्धार -2 गेवरी गाउ मैया कमसे,-2, तोरी महिमा स अपार-2
भावार्थ (Meaning): हे माता! तुम हमारी परम पूजनीय ‘कुलदेवी’ हो। तुम हमारे सारे कष्टों को हर कर हमारा उद्धार (कल्याण) कर दो। मैं (गायक/भक्त/गेवरी) अपनी कम बुद्धि और क्षमता से तुम्हारी महिमा का गान कैसे कर सकता हूँ? क्योंकि हे मैया, तुम्हारी महिमा तो अनंत और अपार है, जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। हे माँ गढ़काली, मैं तुम्हारी आरती करता हूँ।
आरती और पूजा करने का सही समय और नियम (Practices Time of Aarti Gadhkalika Mata Ki)
माँ गढ़कालिका एक जाग्रत देवी हैं और कुलदेवी के रूप में उनकी पूजा का विधान बहुत ही पवित्र और श्रद्धापूर्ण होता है। Practices Time of Aarti Gadhkalika Mata Ki और इसके नियमों को इस प्रकार समझा जा सकता है:
1. सर्वश्रेष्ठ समय और अवसर (Best Practices Time)
- नवरात्रि (Navratri): चैत्र (वसंत) और आश्विन (शारदीय) नवरात्रि के नौ दिन माँ गढ़कालिका की पूजा के लिए सबसे उत्तम माने जाते हैं। विशेषकर महाअष्टमी और महानवमी के दिन कुलदेवी की विशेष पूजा और इस आरती का गायन अनिवार्य रूप से किया जाता है।
- कुलदेवी पूजन (नवाखाई/जातर): जब भी परिवार में कोई शुभ कार्य (विवाह, मुंडन, नए घर में प्रवेश) होता है, तो सबसे पहले कुलदेवी माँ गढ़कालिका का स्मरण किया जाता है और यह आरती गाई जाती है।
- दैनिक संध्या आरती: पवार समाज के लोग और देवी के भक्त अपने घरों में नित्य संध्याकाल (सूर्यास्त के बाद) दीप प्रज्वलित कर इस आरती का पाठ करते हैं।
2. पूजा की विधि (Rituals & Procedure)
- सामग्री: आरती में वर्णित सामग्री के अनुसार थाली में—हल्दी, कुमकुम, साबुत नारियल, बेलपत्र, लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब), धूप, शुद्ध घी का दीपक और कपूर होना अनिवार्य है।
- भोग: देवी को ऋतुफल, मिष्ठान और विशेष पर्वों पर कुल-परंपरा के अनुसार कड़ा प्रसाद (हलवा) या पूड़ी-चने का भोग लगाया जाता है।
- आरती का गान: परिवार के सभी सदस्य एकत्रित होकर, सिर ढककर (सम्मान सूचक) ताली बजाते हुए स्थानीय लोक-धुन में Aarti Gadhkalika Mata Ki का सस्वर गान करते हैं।
धार्मिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व (Importance of Aarti Gadhkalika Mata Ki)
Importance of Aarti Gadhkalika Mata Ki केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है; यह एक पूरे समाज की पहचान, उनका इतिहास और उनका आत्म-विश्वास है:
1. ज्ञान और मेधा की प्राप्ति (Attainment of Knowledge and Intellect)
उज्जैन और धार, दोनों ही स्थानों पर गढ़कालिका का इतिहास ‘ज्ञान’ से जुड़ा है। उज्जैन में कालिदास और धार में राजा भोज इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। जो भी विद्यार्थी या साधक नियमित रूप से माँ गढ़कालिका की इस आरती का पाठ करता है, माता उसके ‘तोल बुद्धि अन ज्ञान’ (बुद्धि और ज्ञान) में अपार वृद्धि करती हैं।
2. कुलदेवी का सुरक्षा कवच (Protection as Kuldevi)
कुलदेवी वह मूल शक्ति होती है जो एक पूरे वंश और रक्त-संबंधों की रक्षा करती है। जब पवार समाज के लोग यह आरती गाते हैं, तो वे दुनिया के किसी भी कोने में हों, माँ गढ़कालिका उनके परिवार को बीमारियों, अकाल मृत्यु और शत्रुओं के षड्यंत्रों से बचाती हैं।
3. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों से जुड़ाव (Connection to Roots)
आरती की पंक्तियां (“धारा नगर ठिकान”, “फैल्या जो पवार”) लोगों को उनके गौरवशाली अतीत की याद दिलाती हैं। यह युवा पीढ़ी को उनके पूर्वजों (राजा भोज) की महानता और उनकी जड़ों (Roots) से जोड़े रखने का एक बेहतरीन मनोवैज्ञानिक साधन (Psychological tool) है। यह आरती सामाजिक एकता का सूत्र है।
4. अहंकार का नाश (Eradication of Ego)
आरती के अंत में जब भक्त कहता है कि “गेवरी गाउ मैया कमसे, तोरी महिमा स अपार”, तो वह अपने बौद्धिक अहंकार को देवी के चरणों में समर्पित कर देता है। यही विनम्रता मनुष्य के आध्यात्मिक उत्थान का सबसे बड़ा कारण बनती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs about Maa Gadhkalika and Aarti)
प्रश्न 1: Gadhkalika Temple Ujjain और Gadhkalika Temple Dhar में क्या संबंध है?
उत्तर: दोनों ही मंदिर माँ कालिका के अत्यंत जाग्रत स्वरूप हैं। उज्जैन का मंदिर एक प्राचीन महाशक्तिपीठ है जहाँ महाकवि कालिदास ने ज्ञान प्राप्त किया था। वहीं, धार (Dhara Nagar) का मंदिर परमार (पवार) राजवंश की कुलदेवी का स्थान है, जहाँ राजा भोज ने उपासना कर अपनी असीम बुद्धि प्राप्त की थी। आरती मुख्य रूप से धार की महिमा और पवार वंश के इतिहास को समर्पित है।
प्रश्न 2: आरती में “राजा भोज” का उल्लेख क्यों किया गया है?
उत्तर: राजा भोज (11वीं शताब्दी) मध्य भारत के परमार (पवार) वंश के सबसे प्रतापी और विद्वान सम्राट थे। उन्होंने ‘धारा नगरी’ (धार) से शासन किया। वे वास्तुकला, ज्योतिष, चिकित्सा और साहित्य के प्रकांड विद्वान थे। पवार समाज मानता है कि राजा भोज को यह असीमित ज्ञान उनकी कुलदेवी माँ गढ़कालिका के आशीर्वाद से ही मिला था, इसलिए आरती में उनके नाम का गौरव गान किया गया है।
प्रश्न 3: क्या यह आरती केवल पवार (परमार) समाज के लोग ही गा सकते हैं?
उत्तर: यद्यपि इस आरती के बोलों में पवार समाज का विशेष उल्लेख है क्योंकि गढ़कालिका उनकी कुलदेवी हैं, लेकिन सनातन धर्म में ईश्वर सबके हैं। कोई भी भक्त जो माँ गढ़कालिका में सच्ची श्रद्धा रखता है, वह ज्ञान, बुद्धि और माता के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए इस आरती का गान कर सकता है।
प्रश्न 4: आरती में “हल्दी कुंकू नारियल” का क्या महत्व है?
उत्तर: हिंदू धर्म में देवी पूजा (विशेषकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की लोक परंपराओं में) ‘हल्दी-कुमकुम’ को सुहाग, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना जाता है। श्रीफल (नारियल) पूर्णता और सात्विक बलि का प्रतीक है। कुलदेवी की पूजा इन शुभ सामग्रियों के बिना अधूरी मानी जाती है।
प्रश्न 5: माँ गढ़कालिका को प्रसन्न करने के लिए कौन सा दिन सबसे शुभ है?
उत्तर: माँ गढ़कालिका की पूजा के लिए मंगलवार, शुक्रवार और विशेष रूप से महीने की अष्टमी तिथि सबसे शुभ मानी जाती है। नवरात्रि के दिनों में माँ के ‘धारा नगर’ और ‘उज्जैन’ स्थित दोनों ही मंदिरों में भक्तों का विशाल मेला लगता है।
प्रश्न 6: “कुलदेवी” और “इष्टदेवी” में क्या अंतर होता है?
उत्तर: ‘कुलदेवी’ वह देवी होती हैं जिनकी पूजा एक ही वंश या गोत्र के लोग पीढ़ियों से करते आ रहे हैं (जैसे पवार समाज की गढ़कालिका)। कुलदेवी परिवार के संस्कारों और रक्त की रक्षक होती हैं। जबकि ‘इष्टदेव/इष्टदेवी’ वह देवी-देवता होते हैं जिन्हें कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत आस्था और आध्यात्मिक रुचि के अनुसार पूजता है।
Aarti Gadhkalika Mata Ki (मैया करूं गढकाली तोरी आरती) केवल एक प्रार्थना नहीं है; यह मध्य प्रदेश के गौरवशाली इतिहास, परमार राजवंश की शूरवीरता, राजा भोज के ज्ञान और महाकवि कालिदास की अमर लेखनी का एक जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। इसका विस्तृत वर्णन (Description), इसका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (Origin – Gadhkalika Temple Dhar and Ujjain), और इसका गहरा भावार्थ (Bhavarth) यह सिद्ध करता है कि भारत की लोक-परंपराओं में कितना गहरा ज्ञान छिपा है।
जो भी साधक या परिवार उचित समय और विधि (Practices Time) के अनुसार, पूरी श्रद्धा से अपनी कुलदेवी माँ गढ़कालिका की इस आरती का पाठ करता है, माता उसके परिवार को ‘तोल बुद्धि अन ज्ञान’ से भर देती हैं। माँ गढ़कालिका का आशीर्वाद हर प्रकार के संकटों को दूर कर जीवन में सुख, शांति, एकता और परम यश (Importance) की स्थापना करता है।