गणपति की सेवा मंगल मेवा Ganpati Ki Seva Mangal Meva Lyrics

Ganpati Ki Seva Mangal Meva Lyrics : भगवान श्री गणेश की आराधना में गाई जाने वाली आरतियों में “Ganpati Ki Seva Mangal Meva” का एक अत्यंत विशिष्ट और पवित्र स्थान है। यह आरती मुख्य रूप से भगवान गणेश की सेवा के फलों, उनके जन्म की कथा, और उनके चमत्कारी स्वरूप का वर्णन करती है। पिछले लेख की तरह, यहाँ इस आरती का संपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत है।

Ganpati Ki Seva Mangal Meva Lyrics

गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विघ्न टरे।
गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विघ्न टरे।
गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विघ्न टरे।
तीन लोक के सकल देवता, द्वार खड़े नित अरजा करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

ऋद्धि सिद्धि दक्षिणा वामा, विराजे अरु आनंद सो चंवर करें।
धूप-दीप अरु लिए आरती, भक्त खड़े जयकारा करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

गुरु के मोदक भोग लगत है, मूषक वाहन चढ़े सारे।
सौम्य रूप को देख गणपति के, विघ्न भागे जा दूर परे॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

भादो मास अरु शुक्ल चतुर्थी, दिन दोपहर दूर परे।
लियो जन्म गणपति प्रभु जी, दुर्गा मन आनंद भरे॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

अद्भुत बाजा बजा इंद्र का, देव बंधु सब गान करें।
श्री शंकर के आनंद उपजा, नाम सुन्यो सब विघ्न टरे॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

आनी विधाता बैठे आसन, इंद्र अप्सरा नृत्य करें।
देखा वेद ब्रह्मा जी जाको, विघ्न-विनाशक नाम धरे॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

एकदंत गजवदन विनायक, त्रिनयन रूप अनुप धरे।
पगखंभ सा उदर पुष्ट है, देव चंद्रमा हंस्य करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

दे श्राप श्री चंद्रदेव को, कलाहीन तत्काल करें।
चौदह लोक में फिरे गणपति, तीन लोक में राज्य करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

उठी प्रभात जप करें ध्यान, कोई ता के कार्य सर्व सरे।
पूजा काल आरती गवाए, ता के सिर यश छत्र फिरे॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

गणपति की पूजा पहले करने से, काम सभी निर्विघ्न सरे।
सभी भक्त गणपति जी के, हाथ जोड़कर स्तुति करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

विस्तृत विवरण (Description of Ganpati Ki Seva Mangal Meva)

Ganpati Ki Seva Mangal Meva भगवान गणेश को समर्पित एक पारंपरिक और अत्यंत मधुर आरती है। ‘मंगल मेवा’ का अर्थ है शुभ फल या कल्याणकारी प्रसाद। इस आरती का मुख्य संदेश यह है कि जो भी भक्त सच्चे मन से गणपति की सेवा करता है, उसे जीवन में सभी प्रकार के शुभ फलों की प्राप्ति होती है और उसके मार्ग में आने वाले सभी विघ्न (बाधाएं) स्वतः ही दूर हो जाते हैं (विघ्न टरे)।

इस आरती में भगवान गणेश के जन्म (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी), देवताओं द्वारा मनाए गए उत्सव, भगवान शिव और माता पार्वती (दुर्गा) के आनंद, और चंद्रदेव को दिए गए श्राप जैसी पौराणिक कथाओं का बहुत ही सुंदर काव्यात्मक रूप में वर्णन (Description) किया गया है। यह आरती केवल स्तुति नहीं है, बल्कि यह श्री गणेश के जीवन से जुड़ी प्रमुख घटनाओं का एक संक्षिप्त सार भी है।

उत्पत्ति और इतिहास (Origin of Ganpati Ki Seva Mangal Meva)

Origin of Ganpati Ki Seva Mangal Meva की जड़ें भारत की समृद्ध लोक-परंपरा और पौराणिक कथाओं में गहराई से जुड़ी हुई हैं।

  • पौराणिक संदर्भ: इस आरती के बोल सीधे तौर पर ‘शिव पुराण’ और ‘गणेश पुराण’ की कथाओं से लिए गए हैं। इसमें भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुए उनके जन्म, ब्रह्मा जी द्वारा उन्हें ‘विघ्न-विनाशक’ नाम दिए जाने, और चंद्रमा द्वारा उनके रूप का उपहास करने पर चंद्रमा को दिए गए श्राप का सीधा उल्लेख है।
  • रचना काल: यह आरती भी लोक-कवियों और संतों द्वारा रचित मानी जाती है, जो समय के साथ मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हुई है। विशेष रूप से उत्तर भारत के कई मंदिरों और घरों में इसका गायन सदियों से किया जा रहा है।

संपूर्ण भावार्थ (Bhavarth of Ganpati Ki Seva Mangal Meva)

इस आरती का आनंद और फल तब कई गुना बढ़ जाता है, जब भक्त इसके अर्थ को समझकर इसका गान करते हैं। यहाँ Bhavarth of Ganpati Ki Seva Mangal Meva का पद-अनुसार सरल अर्थ दिया गया है:

पद 1-2 का भावार्थ

गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विघ्न टरे।

तीन लोक के सकल देवता, द्वार खड़े नित अरजा करें॥

ऋद्धि सिद्धि दक्षिणा वामा, विराजे अरु आनंद सो चंवर करें।

भावार्थ (Meaning): भगवान गणपति की सेवा करना मंगलकारी मेवे (शुभ फलों) के समान है। उनकी सेवा करने से जीवन की सभी बाधाएं टल जाती हैं। स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—तीनों लोकों के सभी देवी-देवता नित्य उनके द्वार पर खड़े होकर उनसे प्रार्थना (अरजा) करते हैं। उनके दाएँ और बाएँ (दक्षिणा वामा) भगवान की दोनों पत्नियाँ, ऋद्धि और सिद्धि विराजमान हैं, जो आनंदपूर्वक उन्हें चंवर डुला रही हैं।

पद 3-4 का भावार्थ

गुरु के मोदक भोग लगत है, मूषक वाहन चढ़े सारे।

सौम्य रूप को देख गणपति के, विघ्न भागे जा दूर परे॥

भादो मास अरु शुक्ल चतुर्थी, दिन दोपहर दूर परे।

लियो जन्म गणपति प्रभु जी, दुर्गा मन आनंद भरे॥

भावार्थ (Meaning): भगवान को गुड़ और मोदक का भोग लगाया जाता है और वे अपने वाहन मूषक (चूहे) पर सवारी करते हैं। गणपति जी के ऐसे शांत और सौम्य रूप को देखकर ही सारे संकट दूर भाग जाते हैं। भाद्रपद (भादो) महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को दोपहर के समय गणपति प्रभु ने जन्म लिया था, जिससे माता पार्वती (दुर्गा) का हृदय आनंद से भर गया था।

पद 5-6 का भावार्थ

अद्भुत बाजा बजा इंद्र का, देव बंधु सब गान करें।

श्री शंकर के आनंद उपजा, नाम सुन्यो सब विघ्न टरे॥

आनी विधाता बैठे आसन, इंद्र अप्सरा नृत्य करें।

देखा वेद ब्रह्मा जी जाको, विघ्न-विनाशक नाम धरे॥

भावार्थ (Meaning): उनके जन्म के अवसर पर देवराज इंद्र के अद्भुत वाद्ययंत्र बजने लगे और सभी देवता मंगल गान करने लगे। भगवान शिव (शंकर) के मन में अत्यंत आनंद उत्पन्न हुआ, क्योंकि यह नाम सुनते ही सारे विघ्न टल जाते हैं। विधाता (ब्रह्मा जी) अपने आसन पर विराजमान हुए और स्वर्ग की अप्सराएं नृत्य करने लगीं। चारों वेदों के ज्ञाता ब्रह्मा जी ने बालक को देखकर उनका नाम ‘विघ्न-विनाशक’ (बाधाओं को नष्ट करने वाला) रखा।

पद 7-8 का भावार्थ

एकदंत गजवदन विनायक, त्रिनयन रूप अनुप धरे।

पगखंभ सा उदर पुष्ट है, देव चंद्रमा हंस्य करें॥

दे श्राप श्री चंद्रदेव को, कलाहीन तत्काल करें।

चौदह लोक में फिरे गणपति, तीन लोक में राज्य करें॥

भावार्थ (Meaning): वे एक दाँत वाले (एकदंत), हाथी के मुख वाले (गजवदन) विनायक हैं, जो शिव के समान तीन नेत्रों (त्रिनयन) वाला अनूप रूप धारण करते हैं। उनके पैर खंभे के समान मजबूत और उदर (पेट) पुष्ट (बड़ा) है। इस रूप को देखकर चंद्रदेव को अहंकारवश हँसी आ गई। इस पर गणपति जी ने तुरंत चंद्रदेव को श्राप देकर उन्हें कलाहीन (चमक से रहित) कर दिया। भगवान गणपति चौदहों लोकों में विचरण करते हैं और तीनों लोकों पर उनका राज्य (प्रभुत्व) है।

पद 9-10 का भावार्थ

उठी प्रभात जप करें ध्यान, कोई ता के कार्य सर्व सरे।

पूजा काल आरती गवाए, ता के सिर यश छत्र फिरे॥

गणपति की पूजा पहले करने से, काम सभी निर्विघ्न सरे।

भावार्थ (Meaning): जो भी व्यक्ति सुबह उठकर (प्रभात) गणपति जी का ध्यान और जप करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध (सरे) हो जाते हैं। पूजा के समय जो यह आरती गाता है, उसके सिर पर यश और कीर्ति का मुकुट सजता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणपति की पूजा करने से सारे काम बिना किसी विघ्न के पूरे हो जाते हैं।

आरती करने का सही समय और नियम (Practices Time of Ganpati Ki Seva Mangal Meva)

पूर्ण फल प्राप्ति के लिए Practices Time of Ganpati Ki Seva Mangal Meva का ध्यान रखना आवश्यक है:

  • प्रातःकालीन पूजा: जैसा कि आरती में ही बताया गया है “उठी प्रभात जप करें ध्यान”, इसे सुबह की बेला में गाना अत्यंत लाभकारी है।
  • गणेश चतुर्थी (भाद्रपद): आरती में भादो मास की शुक्ल चतुर्थी का स्पष्ट उल्लेख है। अतः गणेशोत्सव के 10 दिनों में इसका गायन अनिवार्य रूप से करना चाहिए।
  • विधि: भगवान गणेश को दूर्वा, मोदक और लाल पुष्प अर्पित करने के बाद कपूर या शुद्ध घी का दीपक जलाकर पूरे परिवार के साथ इस आरती का गायन करना चाहिए।

इस आरती का धार्मिक महत्व (Importance of Ganpati Ki Seva Mangal Meva)

Importance of Ganpati Ki Seva Mangal Meva अनंत है, क्योंकि यह सीधे तौर पर भक्त को भगवान गणेश की लीलाओं से जोड़ती है:

  1. कार्यसिद्धि: इस आरती के नियमित गायन से रुके हुए कार्य पूरे होते हैं।
  2. अहंकार का नाश: चंद्रमा की कथा हमें सिखाती है कि हमें किसी के रूप-रंग का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। यह आरती अहंकार को नष्ट कर विनम्रता सिखाती है।
  3. संपूर्ण कथा का पुण्य: चूँकि इस आरती में जन्म से लेकर नामकरण तक की कथाएं हैं, इसके पाठ से गणेश पुराण सुनने के समान पुण्य प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs about Ganpati Ki Seva Mangal Meva)

प्रश्न 1: Ganpati Ki Seva Mangal Meva आरती में चंद्रमा के हंसने और श्राप का क्या अर्थ है?

उत्तर: पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार गणेश जी अपने वाहन मूषक पर जा रहे थे, तभी चंद्रदेव ने उनके बड़े पेट और रूप को देखकर अहंकार से उनका उपहास किया। इस पर गणेश जी ने उन्हें श्राप दिया कि उनका रूप नष्ट हो जाएगा (कलाहीन)। यह प्रसंग हमें शारीरिक रूप पर घमंड न करने की शिक्षा देता है।

प्रश्न 2: आरती में “भादो मास अरु शुक्ल चतुर्थी” का क्या महत्व है?

उत्तर: हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद (भादो) महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इसी दिन से पूरे देश में भव्य ‘गणेश चतुर्थी’ का उत्सव मनाया जाता है।

प्रश्न 3: “ऋद्धि सिद्धि दक्षिणा वामा” से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: भगवान गणेश की दो पत्नियाँ हैं—ऋद्धि (समृद्धि और धन की देवी) और सिद्धि (आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियों की देवी)। ‘दक्षिणा वामा’ का अर्थ है कि वे गणपति के दाएं और बाएं ओर विराजमान होकर उनकी सेवा करती हैं।

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