Gaura Jhula Jhul rahi Bhole nath sang Lyrics : सावन के महीने और ‘हरियाली तीज’ के अवसर पर गाए जाने वाले शिव-पार्वती के अत्यंत मधुर लोक-गीत “Gaura Jhula Jhul rahi Bhole nath sang” का संपूर्ण भावार्थ, उत्पत्ति , गायन का अवसर और सांस्कृतिक महत्व विस्तार से जानें।
गौरा झूला झूल रही भोले नाथ संग Gaura Jhula Jhul rahi Bhole nath sang Lyrics
| गौरा झूला झूल रही भोले नाथ संग (तर्ज : आने से उसके आये बहार, जाने से उसके जाए बहार ) सावन की बरसै रिमझिम फुंहार, पेड़ों पे झूलो की लगी कतार, गौरा झूला झूल रही भोले नाथ संग, मैया झूला झूल रही भोले नाथ संग………. गौरा झूला झूल रही भोले नाथ संग, मैया झूला झूल रही भोले नाथ संग……. कुहू कुहकती है कोयल, पीहू-पीहू पपीहा पुकारेँ, भोले दानी के दर्शन करने, भगत हजारो पधारें, झूलन की रुत है आई, गौरा झूल झूल रही भोले नाथ संग, मैया झूला झूल रही भोले नाथ के संग………. भोले बाबा के डमरुँ पे, नंदी गणपत भी झूम रहे हैं, बादलोँ को भी देखो इन पर, कैसे मोती बरसा रहे है, पवन चले पुरवाई, गौरा झूल झूल रही भोले नाथ संग, मैया झूला झूल रही भोले नाथ के संग………. देवता भी संग में आज, हो कर मगन नाँचते हैं, हाथ जोड़ इनसे, आशीर्वाद सभ माँगते हैं, महिमा ये ना गाई जाए, गौरा झूला झूल रही भोले नाथ संग, मैया झूल झूल रही भोले नाथ के संग, सावन की बरसै रिमझिम फुंहार, पेड़ों पे झूलो की लगी कतार, गौरा झूला झूल रही भोले नाथ संग, मैया झूला झूल रही भोले नाथ के संग… |
सावन की बरसै रिमझिम फुंहार (Sawan Ki Barse Rimjhim Phunhar) – भावार्थ, इतिहास और महिला संगीत महिमा
सनातन हिंदू संस्कृति में श्रावण (सावन) का महीना प्रकृति के नव-यौवन, हरियाली और ईश्वर के प्रति उल्लास का प्रतीक है। सावन में पेड़ों पर झूला डालना और मल्हार गाना एक प्राचीन लोक-परंपरा है। “Sawan Ki Barse Rimjhim Phunhar” एक ऐसा ही अत्यंत आनंदमयी, संगीतमय और वात्सल्य से भरा शिव-पार्वती भजन है।
इस गीत में सावन की प्राकृतिक सुंदरता और भगवान शिव तथा माता पार्वती (गौरा) के झूला झूलने के दिव्य दृश्य का बहुत ही मनमोहक चित्रण किया गया है। यह गीत विशेष रूप से ‘महिला संगीत’ और सावन के उत्सवों की जान है। यहाँ हम इस पावन भजन का गहरा भावार्थ (Bhavarth), इसके गायन के विशेष अवसर और महत्व प्रस्तुत कर रहे हैं।
भजन का विस्तृत विवरण और उत्पत्ति (Description and Origin)
Description (विवरण): यह गीत एक विशुद्ध सावन मल्हार (Sawan Malhar) और ‘महिला संगीत’ (Ladies Sangeet) का लोक-गीत है। इसमें श्रृंगार रस और भक्ति रस का अद्भुत संगम है। गीत में प्रकृति (कोयल, पपीहा, बादल, पुरवाई हवा) को शिव-पार्वती के आनंद में सम्मिलित होते हुए दिखाया गया है।
Origin (उत्पत्ति): इस गीत की पृष्ठभूमि उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, और मध्य प्रदेश) में मनाए जाने वाले ‘हरियाली तीज’ (Hariyali Teej) और सावन के झूलों की परंपरा से जुड़ी है। महिलाएँ जब सावन में एकत्रित होकर झूला झूलती हैं, तो वे स्वयं को माता गौरा के रूप में देखकर ऐसे गीतों का गान करती हैं।
संपूर्ण भावार्थ (Bhavarth)
यह भजन सावन के उल्लास और शिव परिवार के आनंद का एक सजीव दृश्य (Visual Imagery) प्रस्तुत करता है। आइए, इसके मुख्य विषयों का भावार्थ समझें:
1. सावन की छटा और शिव-गौरा का झूला: भक्त प्रकृति का वर्णन करते हुए कहता है कि सावन के महीने में आसमान से रिमझिम (हल्की-हल्की) बारिश की फुहारें गिर रही हैं। आम और कदंब के पेड़ों पर झूलों की कतारें लग गई हैं। इन झूलों पर जगत जननी माता पार्वती (गौरा) अपने स्वामी भोलेनाथ के साथ बड़े ही आनंद से झूला झूल रही हैं।
2. प्रकृति का संगीत और भक्तों की भीड़: शिव-गौरा को झूलता देख पूरी प्रकृति आनंदित है। बागों में कोयल अपनी मीठी आवाज़ (कुहू-कुहू) में गा रही है और पपीहा ‘पीहू-पीहू’ की रट लगा रहा है। भोले दानी के इस मनमोहक स्वरूप के दर्शन करने के लिए हज़ारों की संख्या में भक्त पधार रहे हैं।
3. शिव परिवार का उल्लास: भोलेनाथ जब मस्ती में अपना डमरू बजाते हैं, तो उस डमरू की धुन पर शिव जी का वाहन नंदी और उनके प्यारे पुत्र भगवान गणपति (गणेश जी) भी मगन होकर झूम रहे हैं। आसमान में छाए काले बादल भी बारिश की बूंदों के रूप में शिव परिवार पर मोतियों की वर्षा कर रहे हैं और ठंडी पुरवाई (पूरब की हवा) चल रही है।
4. देवताओं का नृत्य और आशीर्वाद: इस अद्भुत दृश्य को देखकर स्वर्ग के देवता भी स्वयं को रोक नहीं पाते और मगन होकर नाचने लगते हैं। सभी भक्त और देवता हाथ जोड़कर शिव-पार्वती की इस युगल जोड़ी से आशीर्वाद मांग रहे हैं, क्योंकि उनकी महिमा का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।
महिला संगीत में गायन के विशेष अवसर (Practices Time)
यह गीत महिलाओं के उत्सवों और खुशी के मौकों के लिए अत्यंत उपयुक्त है:
- हरियाली तीज और सावन के झूले (Hariyali Teej): सावन के महीने में शुक्ल पक्ष की तृतीया को ‘हरियाली तीज’ मनाई जाती है। इस दिन महिलाएँ सज-धज कर झूला झूलती हैं और शिव-पार्वती की पूजा करते हुए यह गीत विशेष रूप से गाती हैं।
- सावन सोमवार के कीर्तन (Sawan Somwar): सावन के प्रत्येक सोमवार को शिवालयों में या घर पर आयोजित महिला कीर्तन (सत्संग) में यह गीत ढोलक की ताल पर बहुत उत्साह से गाया जाता है।
- शिव-पार्वती विवाह (Shiv Vivah): शिवरात्रि के दिन भी शिव-पार्वती के सुखद दांपत्य जीवन का गान करने के लिए इस गीत को शामिल किया जाता है।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व (Importance)
- दांपत्य प्रेम का प्रतीक (Symbol of Marital Harmony): शिव और पार्वती को आदर्श दंपत्ति माना जाता है। उनका साथ में झूला झूलना पति-पत्नी के बीच के प्रेम, सम्मान और उल्लास को दर्शाता है। यह गीत नव-विवाहित महिलाओं को सुखी दांपत्य का आशीर्वाद देता है।
- प्रकृति के साथ तालमेल (Harmony with Nature): गीत में कोयल, पपीहा, बादल और पुरवाई हवा का ज़िक्र है, जो हमें याद दिलाता है कि सनातन संस्कृति में प्रकृति और ईश्वर को अलग नहीं माना जाता।
- सामूहिक उल्लास: यह गीत समाज को एक साथ जोड़ने, उत्सव मनाने और रोज़मर्रा के तनावों से मुक्त होकर ईश्वर की भक्ति में झूमने का संदेश देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: सावन में शिव-पार्वती के झूला झूलने का क्या महत्व है?
उत्तर: सावन का महीना हरियाली और नव-सृजन का प्रतीक है। झूला झूलना आनंद, मुक्ति और ब्रह्मांड की गति का प्रतीक है। शिव-पार्वती के झूला झूलने का अर्थ है कि पूरी प्रकृति उनके प्रेम और कृपा से आनंदित होकर गतिमान है।
प्रश्न 2: ‘हरियाली तीज’ क्या होती है?
उत्तर: यह सावन के महीने में महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इसलिए इस दिन महिलाएँ शिव-पार्वती की पूजा करती हैं और उनके लोक-गीत गाती हैं।
प्रश्न 3: गीत में ‘पुरवाई’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘पुरवाई’ का अर्थ है पूरब दिशा की ओर से चलने वाली ठंडी और नमी युक्त हवा। सावन के महीने में मानसूनी हवाएं इसी दिशा से आती हैं, जो बारिश और ठंडक लेकर आती हैं।
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