Tu Na Sambhale To Hame Kon Sambhale : भगवान श्री जगन्नाथ के परम समर्पण और भक्ति से भरे अत्यंत भावपूर्ण भजन “Tu Na Sambhale To Hame Kon Sambhale” का संपूर्ण भावार्थ (Bhavarth), ऐतिहासिक उत्पत्ति (Origin), गायन का सही समय (Practices Time) और आध्यात्मिक महत्व (Importance) विस्तार से जानें। नीलाचल वासी श्री जगन्नाथ जी की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए यह विस्तृत लेख पढ़ें।
Tu Na Sambhale To Hame Kon Sambhale
तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले
| तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले जगन्नाथ चक्का नैन नीलाचल वारे जगन्नाथ, जगन्नाथ, चका नैन, चका नैन नीलाचल वारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले मेरी ये नैया है अब तो तेरे हवाले तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले, जगन्नाथ… तुझे छोड़ जाऊं मैं अब किस किसके द्वारे, तुझे छोड़ जाऊं मैं अब किस किसके द्वारे, नीलाचल वारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले, जगन्नाथ… जगन्नाथ स्वामी मेरे नैन के तारे, मेरे सारे काज स्वामी आप ही संवारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले, नीलाचल वारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले, जगन्नाथ… शरण तेरी पड़ा रहूं दास बनाले, तेरी ही सेवा करूं जो चाहे कराले, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले, नीलाचल वारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले, जगन्नाथ… जगन्नाथ स्वामी की जय! |
Jagannath chakka nain neelachal vaare
Jagannath, Jagannath, chaka nain, chaka nain
Neelachal vaare, tu na sambhale to hame kon sambhale
Tu na sambhale to hame kon sambhale
Meri ye naiya hai ab to tere hawale
Tu na sambhale to hame kon sambhale,
Jagannath…
Tujhe chhod jaaun main ab kis kiske dware,
Tujhe chhod jaaun main ab kis kiske dware,
Neelachal vaare, tu na sambhale to hame kon sambhale
Tu na sambhale to hame kon sambhale,
Jagannath…
Jagannath swami mere nain ke taare,
Mere saare kaaj swami aap hi sanwaare,
Tu na sambhale to hame kon sambhale,
Neelachal vaare, tu na sambhale to hame kon sambhale,
Jagannath…
Sharan teri pada rahoon daas banale,
Teri hi seva karoon jo chahe karaale,
Tu na sambhale to hame kon sambhale,
Neelachal vaare, tu na sambhale to hame kon sambhale,
Jagannath…
Jagannath swami ki jai!
तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले (Tu Na Sambhale To Hame Kon Sambhale) – संपूर्ण विवरण, इतिहास और महिमा
सनातन धर्म में उड़ीसा (ओडिशा) के पुरी धाम में विराजमान भगवान श्री जगन्नाथ (Lord Jagannath) को साक्षात परब्रह्म और पूरे जगत का नाथ (स्वामी) माना जाता है। जब भक्त जीवन के संघर्षों से थक जाता है और उसे कोई मार्ग नहीं सूझता, तब वह पूर्ण समर्पण के साथ अपने ईष्ट को पुकारता है। “Tu Na Sambhale To Hame Kon Sambhale” एक ऐसा ही अत्यंत मार्मिक, करुण और आत्म-समर्पण (Surrender) से भरा भजन है। यह भजन एक भक्त की पुकार है, जो अपनी जीवन रूपी नैया की पतवार भगवान जगन्नाथ के हाथों में सौंप देता है।
इस अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ज्ञानवर्धक लेख में हम परम पावन जगन्नाथ भजन Tu Na Sambhale To Hame Kon Sambhale का संपूर्ण पाठ, इसकी साहित्यिक व लोक-परंपरागत उत्पत्ति (Origin), गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक भावार्थ (Bhavarth), इसके गान और श्रवण करने की सही विधि व समय (Practices Time), इसका आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक व लौकिक महत्व (Importance) और इससे जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) प्रस्तुत कर रहे हैं।
भजन का विस्तृत विवरण (Description of the Bhajan)
Description of Tu Na Sambhale To Hame Kon Sambhale को समझना ‘शरणागति’ (पूर्ण समर्पण) के रहस्य को समझना है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक डूबते हुए इंसान की उस परम सत्ता को पुकार है, जो पूरे ब्रह्मांड को संभालती है।
इस भजन में भगवान जगन्नाथ के स्वरूप का बहुत ही सूक्ष्म और सुंदर वर्णन किया गया है। उन्हें ‘चका नैन’ (Chaka Nain) कहा गया है। उड़िया भाषा में भगवान जगन्नाथ को ‘चकाडोळा’ (गोल नेत्रों वाले) कहा जाता है। उनके नेत्रों में पलकें नहीं हैं, जिसका अर्थ है कि वे कभी सोते नहीं हैं और दिन-रात अपने भक्तों की रक्षा के लिए उन्हें निहारते रहते हैं। उन्हें ‘नीलाचल वारे’ (Nilachal Ware) कहा गया है, क्योंकि पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर जिस पवित्र स्थान पर बना है, उसे नीलाचल पर्वत (Blue Mountain) कहा जाता है।
उत्पत्ति और इतिहास (Origin of the Bhajan)
Origin of Tu Na Sambhale To Hame Kon Sambhale की पृष्ठभूमि जगन्नाथ संस्कृति (Jagannath Sanskruti) और भारतीय भक्ति आंदोलन से जुड़ी हुई है।
- भक्ति साहित्य (Bhakti Literature): यह भजन पारंपरिक रूप से उत्तर भारत और ओडिशा के वैष्णव संतों की ‘शरणागति’ भावना से प्रेरित है। जहाँ भगवान कृष्ण (जगन्नाथ) को ही जीवन का एकमात्र आधार माना गया है।
- आधुनिक प्रस्तुति (Modern Era): आधुनिक समय में इस भजन को कई प्रसिद्ध भजन गायकों (जैसे मृदुल कृष्ण शास्त्री जी और अन्य संतों) ने अपनी कथाओं और संकीर्तनों में गाकर इसे घर-घर तक पहुँचाया है। विशेषकर इस्कॉन (ISKCON) और जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान यह धुन अत्यंत भावपूर्ण तरीके से गाई जाती है।
संपूर्ण भावार्थ (Bhavarth of the Bhajan)
यह भजन भक्त और भगवान के बीच एक बहुत ही आत्मीय और व्यक्तिगत संवाद है। आइए, Bhavarth का एक-एक पद और शब्द का अत्यंत विस्तृत विश्लेषण करें:
मुखड़ा का भावार्थ
जगन्नाथ चक्का नैन नीलाचल वारे… मेरी ये नैया है अब तो तेरे हवाले तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले
भावार्थ (Meaning): हे जगन्नाथ (जगत के नाथ)! हे गोल और बड़ी-बड़ी आंखों वाले (चका नैन)! हे नीलाचल (पुरी धाम) के वासी! यदि आप हमें नहीं संभालेंगे (हमारी रक्षा नहीं करेंगे), तो इस संसार में और कौन है जो हमें संभाल सकता है? हे प्रभु, मैंने अपने जीवन रूपी इस नाव (नैया) को पूरी तरह से आपके हवाले (आपके भरोसे) कर दिया है। अब इसे पार लगाना आपकी ज़िम्मेदारी है।
पद 1 का भावार्थ (अनन्य भक्ति)
तुझे छोड़ जाऊं मैं अब किस किसके द्वारे, नीलाचल वारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले
भावार्थ (Meaning): हे प्रभु! इस स्वार्थी संसार में मेरा अपना कोई नहीं है। यदि मैं आपका द्वार (चौखट) छोड़ दूँ, तो मैं अपनी फरियाद लेकर किस-किस के दरवाजे पर भटकता फिरूंगा? आप ही मेरे एकमात्र रक्षक हैं। हे नीलाचल के स्वामी, यदि आप मेरा हाथ छोड़ देंगे, तो मुझे संभालने वाला कोई दूसरा नहीं है।
पद 2 का भावार्थ (दृढ़ विश्वास)
जगन्नाथ स्वामी मेरे नैन के तारे, मेरे सारे काज स्वामी आप ही संवारे,
भावार्थ (Meaning): हे जगन्नाथ स्वामी! आप मुझे मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं, आप मेरी आंखों के तारे हैं। मुझे यह पूर्ण विश्वास है कि मेरे जीवन के जितने भी बिगड़े हुए काम (काज) हैं, वे मेरी मेहनत से नहीं, बल्कि केवल और केवल आपकी कृपा से ही संवरते (पूरे होते) हैं।
पद 3 का भावार्थ (दास भाव और सेवा)
शरण तेरी पड़ा रहूं दास बनाले, तेरी ही सेवा करूं जो चाहे कराले,
भावार्थ (Meaning): हे दीनानाथ! मेरी केवल यही अभिलाषा है कि मैं जीवन भर आपकी शरण में (आपके चरणों में) पड़ा रहूं। मुझे अपना सबसे छोटा दास (सेवक/नौकर) बना लीजिए। मैं केवल आपकी ही सेवा करना चाहता हूँ, आप मुझसे जो भी कार्य करवाना चाहें (जो चाहे कराले), करवा लें, पर मुझे अपने से दूर न करें। क्योंकि आपके बिना मुझे संभालने वाला कोई नहीं है।
भजन गायन और श्रवण का सही समय (Practices Time)
ईश्वर के प्रति समर्पण व्यक्त करने का कोई एक निश्चित समय नहीं होता। फिर भी, आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा के लिए Practices Time of Tu Na Sambhale के कुछ विशेष अवसर इस प्रकार हैं:
- विपत्ति और संकट के समय (Times of Distress): जब भी आप जीवन में खुद को अकेला पाएं, मन अवसाद (Depression) या चिंता से घिरा हो, तब एकांत में बैठकर इस भजन को सुनने से मन को यह असीम शांति मिलती है कि “ईश्वर मुझे संभाल रहे हैं।”
- भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा (Rath Yatra): आषाढ़ मास में होने वाली भगवान जगन्नाथ की विश्व-प्रसिद्ध रथ यात्रा के दौरान इस भजन का गान अत्यंत पुण्यदायी और उल्लासपूर्ण माना जाता है।
- गुरुवार का दिन (Thursdays): गुरुवार का दिन भगवान विष्णु (जगन्नाथ) को समर्पित है। इस दिन की पूजा और आरती के बाद इसे सुनना बहुत शुभ होता है।
- शयन काल (Bedtime): रात को सोने से पहले इसे सुनने से मन की सारी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं और व्यक्ति ईश्वर के भरोसे एक शांत नींद प्राप्त करता है।
धार्मिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक महत्व (Importance)
Importance of Tu Na Sambhale To Hame Kon Sambhale मनुष्य के मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालता है:
1. शरणागति और तनाव से मुक्ति (Surrender and Stress Relief)
जब भक्त यह गाता है कि “मेरी ये नैया है अब तो तेरे हवाले”, तो वह मनोवैज्ञानिक रूप से अपने जीवन का सारा भारी बोझ (Stress, Anxiety, Fear of Future) भगवान के कंधों पर डाल देता है। यह पूर्ण समर्पण (शरणागति) मनुष्य को अत्यधिक चिंता से मुक्त कर मानसिक शांति प्रदान करता है।
2. अहंकार का नाश (Eradication of Ego)
भजन की पंक्तियां “दास बनाले” और “मेरे सारे काज आप ही संवारे” मनुष्य के भीतर बैठे इस झूठे अहंकार (Ego) को नष्ट करती हैं कि “मैं सब कुछ कर रहा हूँ।” यह विनम्रता व्यक्ति को समाज में एक बेहतर इंसान बनाती है।
3. अटूट विश्वास (Unshakable Faith)
यह भजन ईश्वर के प्रति एक अटूट विश्वास (Faith) पैदा करता है। जब मनुष्य को यह विश्वास हो जाता है कि नीलाचल के स्वामी हमेशा उसे निहार रहे हैं (चका नैन), तो वह जीवन की किसी भी कठिन परिस्थिति से नहीं घबराता।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
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भगवान जगन्नाथ को ‘चका नैन’ क्यों कहा जाता है?
‘चका नैन’ या उड़िया भाषा में ‘चकाडोळा’ का अर्थ है गोल और बड़ी आंखों वाले। भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में उनकी आंखें बहुत बड़ी और गोल होती हैं, और उनमें पलकें नहीं होतीं। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि परब्रह्म कभी सोते नहीं हैं; वे अपनी बिना झपकने वाली बड़ी आंखों से दिन-रात पूरे ब्रह्मांड और अपने भक्तों की रक्षा के लिए उन्हें निहारते रहते हैं।
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‘नीलाचल’ का क्या अर्थ है और यह कहाँ स्थित है?
‘नीलाचल’ (नीला पर्वत) ओडिशा राज्य के पुरी शहर का प्राचीन और पवित्र नाम है। मान्यता है कि इसी पवित्र भूमि पर भगवान जगन्नाथ का मूल स्वरूप (नीलमाधव) प्रकट हुआ था। इसलिए भगवान जगन्नाथ को ‘नीलाचल वासी’ या ‘नीलाचल नाथ’ कहा जाता है।
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इस भजन में नैया (नाव) किसका प्रतीक है?
भारतीय दर्शन में ‘नैया’ (नाव) मनुष्य के जीवन का प्रतीक है, और यह संसार एक महासागर (भवसागर) है। भक्त प्रार्थना कर रहा है कि हे ईश्वर, मेरे जीवन रूपी इस नाव को आप ही संभालें, अन्यथा यह संसार के दुखों और प्रपंचों में डूब जाएगी।
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भगवान जगन्नाथ किसके अवतार हैं?
भगवान जगन्नाथ साक्षात भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के ही रूप हैं। पुरी धाम में वे अपने बड़े भाई बलराम (बलभद्र) और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं।
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क्या इस भजन को घर की दैनिक पूजा में गाया जा सकता है?
हाँ, बिल्कुल! यह एक अत्यंत शांत, वैराग्यपूर्ण और समर्पण से भरा भजन है। आप इसे अपने घर के मंदिर में भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या जगन्नाथ जी की मूर्ति/तस्वीर के सामने पूर्ण श्रद्धा के साथ गा सकते हैं।